डायमंड किंग सावजी ढोलकिया की कहाणी जो हार युवा को पता होना जरुरी हे
एक मामुली मजदूर से डायमंड किंग बनने की कहानी
सपने सिर्फ देखने के लिए नही होते, उन्हे पुरा करने की जिद्द भी होनी चाहिये ! यह बात पर इतरा सच साबित होते है भारत के हिरा व्यापारी सावजी भाई ढोलकीया के कहानी से.
* एक गरीब किसन घर मे जन्मे इस इंसान ने गरिबी, संघर्ष, असफलता- हार कठीनाई को पार कर " हरिकृष्णा एक्सपोर्टर " जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी खडी की, जो आज 90 से ज्यादा देशो में अपना व्यापार कर रही है!
आज कूछ उनके जीवन की कथा :
एक साची कहाणी जिसमे उनकी मेहनत, त्याग और पारिवारिक संस्कारों का सुंदर संगम देखने को मिलता है।
शुरुआत एक छोटे गांव से __
सावजी भाई का जन्म गुजरात के अमरेली जिले की एक छोटे से गांव दूधना में 12 अप्रैल 1962 को हुआ । उनका परिवार किसान
था और आमदनी बहुत कम थी । बचपन से ही उन्होंने खेतों में काम किया था। परिवार की मदद की और गरीब का सम्मान किया उनकी शिक्षा सिर्फ कक्षा 4 तक हुई है उनका पढ़ाई में मन नहीं लगाता था।
घर की स्थिति भी ऐसी थी की सावजी भाई को ज्यादा पढ़ाई कर पाना मुश्किल था । लेकिन उनका सपना कुछ और ही था!
वह गरीबी से बाहर निकलना चाहते थे अपने सपनों को पंख देने के लिए 13 साल की उम्र में उन्होंने काम करना शुरू किया
सावजी भाई का सूरत की ओर पहला कदम मजदूर से शुरुआत!
साल 1977 में 15 साल की उम्र में सावजी भाई सूरत आए, उनके मामा हीरो का व्यापार करते थे इसलिए उन्होंने भी हीरा पॉलिशिंग के काम में हाथ बटाना शुरू किया। शुरुआत में सिर्फ ₹100 महीना कमाते थे और एक वर्कर की तरह काम करते थे।
लेकिन उन्होंने वहीं से सीखना शुरू किया। जैसे हीरे को कैसे पहचाना जाता है। कैसे उसे कसा जाता है। अगर सूझबूझ हो तो व्यापार बड़ा किया जा सकता है।
* हरिकृष्ण एक्सपोर्टर की शरुआत
1992 में उन्होंने हरि कृष्ण एक्सपोर्टर प्राइवेट लिमिटेड नाम से कंपनी बनाई। यह शुरुआत छोटी सी थी। एक मजदूर और एक छोटा ऑफिस। धीरे-धीरे उनके काम की शुरुआत और समय पर डिलीवरी के लिए उनकी पहचान बनती गई। विदेशी ग्राहक भी उनकी सच्चाई और मेहनत को पहचानने लगे।
आज उनकी कंपनी में 8000 से ज्यादा कर्मचारी है और हर साल अरबों का टर्नओवर होता है। अमेरिका, यूरोप, हॉन्ग कोंग, चीन, दुबई हर जगह उनके क्लायंट है।
* इनाम में कार " वाली घटना से बनी पहचान
2014 में सावजी भाई पूरे देश की नजरों में तब आए जब उन्होंने अपने 491 कर्मचारियों को दिवाली पर बोनस के रूप में कार, फ्लैट और ज्वेलरी गिफ्ट की ।
इससे पहले भी उन्होंने कई कर्मचारियों को महंगी गाड़ियां मकान और कीमती ज्वेलरी उपहार में दे दी थीं।
" उनका कहना था कि यह सब उनके परिवार का हिस्सा है। अगर कंपनी मुनाफा कमाती हैं तो उनका हिस्सा उनको भी मिला चाहिए!
2016 में भी 1700 कर्मचारियों को दिवाली में कार और फ्लैट गिफ्ट दी गई
* अपने बेटेको को जीवन का मूल्य सीखाने वाली घटना
2017 में सावजी भाई ने अपने बेटे द्रव्य ढोलकिया को अमेरिका भेजा । लेकिन किसी कॉलेज में नहीं! या कोई बिज़नस क्लास में नहीं । बल्कि बिना पैसा , कोई सुख सुविधा दिए। द्रव्य को कहा गया कि तुम्हें एक महीने तक खुद मेहनत करके जीना होगा, खुद कमाना खाना और रहना होगा ।
द्रव्य ने अमेरिका में अलग अलग शहरों में रेस्टोरेंट में काम किया, झाड़ू पूछा किया, बर्तन धोए, और कही दिन भूखा भी रहा .
जब वो भारत लौटा, उसके अंदर जमीन से जुड़ी समझ, संघर्ष और साहस था।
सावजी भाई मानना था कि , धन से ज्यादा जरूरी अनुभव और संघर्ष की समझ "
* आज की स्थिति और सोच
आज सावजी भाई की कंपनी हार साल करीब 6000 करोड़ का कारोबार करती है । उनकी सफलता का मूल मंत्र - ईमानदारी, मेहनत और कर्मचारियों के साथी परिवार जैसा रिश्ता ।
वे कहते हैं " व्यापार सिर्फ लाभ कमाने ले लिया नहीं होता बल्कि समाज को कुछ लौटने का भी माध्यम होना चाहिए।
निष्कर्ष: सावजी ढोलकिया की कहानी उन लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है जो छोटे गांव से और बड़े सपने देखते है । वह दिखाते हैं की शुरुआत चाहे छोटी हो अगर सोच बड़ी हो तो सफलता नश्चित है काम कोई भी छोटा नहीं होता, मेहनत नियमित होनी चाहिए।
व्यापार में धन से ज्यादा मूल्य लोगों का विश्वास मायने रखता है। उनकी कहानी भारत को बताती है। अगर हम ठान ले तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता.
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